प्रकृति = प्र+कृति- प्र-का अर्का - प्रकाष्ट (उत्तम) कृति- अर्थ - रचना प्रकृति के द्वारा ही पूरे ब्रह्माण्ड की रचना किया गया है।
प्रकृति दो प्रकार के रूप देखने को मिलते (i) जरायुन (ii) प्राकृतिक
दोनो मिल कर हजारों प्रकार के योनिओ मे जीव प्राणी पैदा किये,
जिसमे मनुष्य को पंच महाभूत पंच तत्व है- आकाश वायु अग्नि जल पुथ्वी , शून्य मात्रा मे देखा जाता है
1 प्राकृतिक व पंचमहाभूत से जीव को एक शरीर दिखाई तो नहीं देते है- नष्ट होने पर पुन: पृथ्वी पर शून्य की माता देखा जाता है।
प्रकृति और मानव के बीच मे तीन दोषी को प्राकृतिक क्रिया कलाक द्वारा देखा जाता है।
(i) वात (ii) पित्त (iii) कफ
प्रत्येक जीव प्राणी के जीवन काल में तीनो गुणो का बहुत अधिक महत्व है
तीनों गुणो मे कि किसी एक गुण से प्रत्येक जीव को शरीर रूप प्रदान होता है।
तीनो गुणों मे प्रत्येक जीव प्राणी को एक गुण शरीर रूप मे विद्यमान पाया जाता है और दूसरा गुण मानव के क्रिया कालापो व कार्य शैली मे पूर्ण रूप से विद्यमान पाया जाता है अभी तक यही देखा गया है प्रत्येक जीव प्राणी के अंदर दो हीं तत्वों की प्रधानता देखा गया है